Radha Krishna deities adorned with flower garlands on temple altar with pink backdrop
    Krishna sacred lotus feet divine symbols spiritual worship
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    मंगल आरती

    मंगल आरती इस्कॉन मंदिरों में भोर में (आमतौर पर सुबह 4:30 बजे) की जाने वाली पहली आरती है। यह दिन की शुरुआत भगवान की महिमा और गुरु की कृपा का स्मरण करके करने का एक अत्यंत पावन अवसर है।

    कृष्णकृपामूर्ति श्री श्रीमद ए.सी. भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद के प्रति कृतज्ञता के साथ।

    श्री श्री गुर्वाष्टकम्

    श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर द्वारा रचित गुरुदेव की महिमा का स्तोत्र।

    श्लोक 1

    संसार-दावानल-लीढ-लोक / त्राणाय कारुण्य-घनाघनत्वम् । प्राप्तस्य कल्याण-गुणार्णवस्य / वन्दे गुरोः श्री-चरणारविन्दम् ॥

    अर्थ: जो आध्यात्मिक गुरु संसार रूपी दावानल (भयंकर अग्नि) में जल रहे जीवों का उद्धार करने के लिए दया के घने मेघ के समान हैं, उन कल्याणकारी गुणों के सागर श्री गुरुदेव के चरण कमलों की मैं वंदना करता हूँ।

    श्लोक 2

    महाप्रभोः कीर्तन-नृत्य-गीत / वादित्र-माद्यन्-मनसो रसेन । रोमाञ्च-कम्पाश्रु-तरङ्ग-भाजो / वन्दे गुरोः श्री-चरणारविन्दम् ॥

    अर्थ: जो श्री चैतन्य महाप्रभु के संकीर्तन में नृत्य, वादन और गायन करते हुए कृष्ण-प्रेम के रस में मग्न रहते हैं, और जिनके शरीर में रोमांच, कम्प तथा अश्रुओं की तरंगें उठती हैं, उन श्री गुरुदेव के कमल चरणों की मैं वंदना करता हूँ।

    श्लोक 3

    श्री-विग्रहारधन-नित्य-नाना / शृङ्गार-तन्-मन्दिर-मार्जनादौ । युक्तस्य भक्तांश् च नियुञ्जतोऽपि / वन्दे गुरोः श्री-चरणारविन्दम् ॥

    अर्थ: जो श्री श्री राधा-कृष्ण अर्चा-विग्रह की सेवा, नित्य नाना प्रकार के शृंगार और मंदिर के मार्जन (सफाई) आदि कार्यों में स्वयं संलग्न रहते हैं तथा अपने शिष्यों को भी इस सेवा में लगाते हैं, उन श्री गुरुदेव के कमल चरणों की मैं वंदना करता हूँ।

    श्लोक 4

    चतुर्-विध-श्री-भगवत्-प्रसाद / स्वाद्व्-अन्न-तृप्तान् हरि-भक्त-सङ्घान् । कृत्वैव तृप्तिं भजतः सदैव / वन्दे गुरोः श्री-चरणारविन्दम् ॥

    अर्थ: जो भगवान् को अर्पित चार प्रकार के स्वादिष्ट प्रसादों (चबाकर, चूसकर, चाटकर और पीकर खाने वाले) से हरि-भक्तों को तृप्त करते हैं और भक्तों को तृप्त देखकर स्वयं परम संतोष का अनुभव करते हैं, ऐसे श्री गुरुदेव के चरण कमलों की मैं वंदना करता हूँ।

    श्लोक 5

    श्री-राधिका-माधवयोर् अपार / माधुर्य-लीला गुण-रूप-नाम्नाम् । प्रति-क्षणास्वादन-लोलुपस्य / वन्दे गुरोः श्री-चरणारविन्दम् ॥

    अर्थ: जो श्री श्री राधा-माधव के अपार माधुर्यमयी लीलाओं, उनके दिव्य गुणों, रूपों और मंगलमय नामों का प्रति-क्षण आस्वादन करने के लिए लालायित रहते हैं, उन श्री गुरुदेव के चरण कमलों की मैं वंदना करता हूँ।

    श्लोक 6

    निकुञ्ज-यूनो रति-केलि-सिद्ध्यै / या यालिभिर् युक्तिर् अपेक्षणीया । तत्राति-दाक्ष्याद् अति-वल्लभस्य / वन्दे गुरोः श्री-चरणारविन्दम् ॥

    अर्थ: वृन्दावन के निकुंजों में श्री श्री राधा-कृष्ण की प्रेममयी लीलाओं की सिद्धि के लिए गोपियाँ जो भी योजनाएँ बनाती हैं, उनमें श्री गुरुदेव अत्यंत दक्षता से सहायता करते हैं, इसलिए वे भगवान को अत्यंत प्रिय हैं। ऐसे श्री गुरुदेव के कमल चरणों की मैं वंदना करता हूँ।

    श्लोक 7

    साक्षाद्-धरित्वेन समस्त-शास्त्रैर् / उक्तस् तथा भाव्यत एव सद्भिः । किन्तु प्रभोर् यः प्रिय एव तस्य / वन्दे गुरोः श्री-चरणारविन्दम् ॥

    अर्थ: समस्त शास्त्रों द्वारा श्री गुरुदेव को साक्षात् श्री हरि के समान ही बताया गया है, और सभी संत उन्हें इसी रूप में मानते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि वे भगवान के अत्यंत प्रिय और अंतरंग सेवक हैं। ऐसे श्री गुरुदेव के कमल चरणों की मैं वंदना करता हूँ।

    श्लोक 8

    यस्य प्रसादाद् भगवत्-प्रसादो / यस्याप्रसादान् न गतिः कुतोऽपि । ध्यायन् स्तुवंस् तस्य यशस् त्रि-सन्ध्यं / वन्दे गुरोः श्री-चरणारविन्दम् ॥

    अर्थ: श्री गुरुदेव की कृपा से ही भगवान की कृपा प्राप्त होती है, और बिना उनकी कृपा के जीव की कहीं भी कोई गति नहीं है। इसलिए मैं प्रतिदिन तीनों संध्याओं (सुबह, दोपहर, शाम) में उनके यश का ध्यान एवं गान करते हुए, उन श्री गुरुदेव के चरण कमलों की वंदना करता हूँ।

    प्रणति मन्त्र

    हरि हरये नमः के पश्चात और नृसिंह आरती से पूर्व, श्रील प्रभुपाद तथा पञ्च-तत्त्व को सादर प्रणाम।

    श्रील प्रभुपाद प्रणति

    श्लोक 1

    नम ॐ विष्णु-पादाय कृष्ण-प्रेष्ठाय भू-तले । श्रीमते भक्तिवेदान्त-स्वामिन् इति नामिने ॥

    अर्थ: मैं श्रील ए.सी. भक्तिवेदान्त स्वामी प्रभुपाद को सादर नमस्कार करता हूँ, जो इस पृथ्वी पर भगवान कृष्ण को अत्यंत प्रिय हैं और जिन्होंने भगवान विष्णु के चरण-कमलों की शरण ग्रहण की है।

    श्लोक 2

    नमस् ते सारस्वते देवे गौर-वाणी-प्रचारिणे । निर्विशेष-शून्यवादि-पाश्चात्य-देश-तारिणे ॥

    अर्थ: हे श्रील सरस्वती ठाकुर के दिव्य सेवक! आपको बारंबार प्रणाम है। आप श्री चैतन्य महाप्रभु के संदेश का प्रचार कर रहे हैं और पाश्चात्य देशों के लोगों का उद्धार कर रहे हैं, जो निर्विशेषवाद (व्यक्ति-रहित ब्रह्म) तथा शून्यवाद से ग्रसित हैं।

    पञ्च-तत्त्व महा-मन्त्र

    पञ्च-तत्त्व महा-मन्त्र

    (जय) श्री-कृष्ण-चैतन्य प्रभु नित्यानन्द । श्री-अद्वैत गदाधर श्रीवासादि-गौर-भक्त-वृन्द ॥

    अर्थ: श्री कृष्ण चैतन्य, प्रभु नित्यानन्द, श्री अद्वैत आचार्य, श्री गदाधर पण्डित, श्रीवास ठाकुर तथा भगवान गौरांग के समस्त भक्तों की जय हो।

    हरि हरये नमः कृष्ण यादवाय नमः

    भगवान और उनके पार्षदों की महिमा का संकीर्तन।

    श्लोक 1

    हरि हरये नमः कृष्ण यादवाय नमः । यादवाय माधवाय केशवाय नमः ॥

    अर्थ: भगवान हरि को नमस्कार है। यदु वंश में प्रकट होने वाले भगवान कृष्ण को नमस्कार है। माधव और केशव को भी बारंबार नमस्कार है।

    श्लोक 2

    गोपाल गोविन्द राम श्री-मधुसूदन । गिरिधारी गोपीनाथ मदन-मोहन ॥

    अर्थ: हे गोपाल, हे गोविन्द, हे राम, हे मधुसूदन! आप गिरिधारी (गोवर्धन पर्वत धारण करने वाले), गोपीनाथ (गोपियों के प्राणनाथ), और मदन-मोहन (कामदेव को भी मोहित करने वाले) हैं।

    श्लोक 3

    श्री-चैतन्य-नित्यानन्द श्री-अद्वैत-सीता । हरि गुरु वैष्णव भागवत गीता ॥

    अर्थ: श्री चैतन्य महाप्रभु, श्री नित्यानंद प्रभु, श्री अद्वैत आचार्य और माता सीता ठाकुरानी की जय हो। श्री हरि, आध्यात्मिक गुरु, सभी वैष्णव भक्त, श्रीमद्भागवतम् और भगवद्गीता को मेरा प्रणाम।

    श्लोक 4

    श्री-रूप सनातन भट्ट-रघुनाथ । श्री-जीव गोपाल-भट्ट दास-रघुनाथ ॥

    अर्थ: मैं षड्-गोस्वामियों को प्रणाम करता हूँ: श्री रूप गोस्वामी, श्री सनातन गोस्वामी, रघुनाथ भट्ट गोस्वामी, श्री जीव गोस्वामी, गोपाल भट्ट गोस्वामी, और रघुनाथ दास गोस्वामी।

    श्री नृसिंह आरती

    भगवान नृसिंहदेव से सुरक्षा और भक्ति में विघ्नों के नाश की प्रार्थना।

    संस्कृत श्लोक

    श्लोक 1

    नमस् ते नरसिंहाय / प्रह्लादाह्लाद-दायिने । हिरण्यकशिपोर् वक्षः / शिला-टङ्क-नखालये ॥

    अर्थ: मैं भगवान नृसिंहदेव को नमस्कार करता हूँ, जो भक्त प्रह्लाद को आनंद देने वाले हैं और जिनके नाखून पत्थर के समान कठोर हिरण्यकशिपु की छाती को चीरने वाले छेनी के समान हैं।

    श्लोक 2

    इतो नृसिंहः परतो नृसिंहो / यतो यतो यामि ततो नृसिंहः । बहिर् नृसिंहो हृदये नृसिंहो / नृसिंहम् आदिं शरणं प्रपद्ये ॥

    अर्थ: भगवान नृसिंहदेव यहाँ हैं, और वे वहाँ भी हैं। मैं जहाँ कहीं भी जाता हूँ, वहाँ भगवान नृसिंहदेव उपस्थित हैं। वे हृदय के भीतर हैं और बाहर भी। मैं उन आदि भगवान नृसिंहदेव की शरण ग्रहण करता हूँ।

    श्लोक 3

    तव कर-कमल-वरे नखम् अद्भुत-शृङ्गं / दलित-हिरण्यकशिपु-तनु-भृङ्गम् । केशव धृत-नरहरि-रूप जय जगदीश हरे ॥

    अर्थ: हे केशव! हे नरहरि रूप धारण करने वाले जगदीश्वर! आपकी जय हो। जिस प्रकार व्यक्ति अपनी उँगलियों से एक भौंरे को आसानी से कुचल देता है, उसी प्रकार आपने अपने कर-कमलों के अद्भुत एवं तीक्ष्ण नाखूनों से हिरण्यकशिपु के शरीर को चीर डाला है।

    श्री तुलसी आरती

    भक्ति की देवी एवं भगवान अत्यंत प्रिय, तुलसी महारानी की वंदना।

    श्री तुलसी प्रणाम मन्त्र

    श्री तुलसी प्रणाम मन्त्र

    वृन्दायै तुलसी-देव्यै / प्रियायै केशवस्य च । विष्णु-भक्ति-प्रदे देवि / सत्यवत्यै नमो नमः ॥

    अर्थ: मैं तुलसी देवी, जिन्हें वृन्दा भी कहा जाता है, को बारम्बार प्रणाम करता हूँ। वे भगवान केशव को अत्यंत प्रिय हैं। हे देवी, आप जीवों को भगवान विष्णु की शुद्ध भक्ति प्रदान करने वाली हैं और सत्य से परिपूर्ण हैं।

    श्री तुलसी आरती

    श्लोक 1

    नमो नमः तुलसी कृष्ण-प्रेयसी नमो नमः । राधा-कृष्ण-सेवा पाब एइ अभिलाषी ॥

    अर्थ: हे तुलसी महारानी! हे कृष्ण की प्रियसी! मैं आपको बारम्बार प्रणाम करता हूँ। मेरी एकमात्र अभिलाषा यही है कि मुझे श्री श्री राधा-कृष्ण की परम सेवा प्राप्त हो।

    श्लोक 2

    ये तोमार शरण लोय, तार वाञ्छा पूर्ण होय । कृपा कोरि' करो तारे वृन्दावन-वासी ॥

    अर्थ: जो भी व्यक्ति आपकी शरण ग्रहण करता है, उसकी सभी आध्यात्मिक इच्छाएं पूर्ण हो जाती हैं। कृपा करके आप मुझे वृन्दावन का वासी बना लें, ताकि मैं वहाँ भगवान की लीलाओं में मग्न रहूँ।

    श्लोक 3

    मोर एइ अभिलाष, विलास कुञ्जे दिओ वास । नयन हेरिबो सदा युगल-रूप-राशि ॥

    अर्थ: मेरी यही इच्छा है कि आप मुझे वृन्दावन के कुंजों (जहाँ भगवान अपनी लीलाएँ करते हैं) में निवास प्रदान करें। इस प्रकार मैं अपने नेत्रों से युगल किशोर श्री श्री राधा-कृष्ण के अद्भुत और सुंदर रूप के सदा दर्शन कर सकूँगा।

    श्लोक 4

    एइ निवेदन धर, सखीर अनुगत करो । सेवा-अधिकार दिये करो निज दासी ॥

    अर्थ: मेरा यही निवेदन स्वीकार करें कि आप मुझे वृन्दावन की गोपियों (सखियों) का अनुगामी बनाएं। मुझे सेवा का अधिकार प्रदान करें और अपनी दासी स्वीकार करें।

    श्लोक 5

    दीन कृष्ण-दासे कोय, एइ येन मोर होय । श्री-राधा-गोविन्द-प्रेमे सदा येन भासि ॥

    अर्थ: अत्यंत दीन यह कृष्णदास (लेखक) कहता है: मेरी यही विनती है कि मैं सदा-सर्वदा श्री श्री राधा और गोविन्द के प्रेम-रस में डूबा रहूँ।

    श्री तुलसी प्रदक्षिणा मन्त्र

    श्री तुलसी प्रदक्षिणा मन्त्र

    यानि कानि च पापानि / ब्रह्म-हत्यादिकानि च । तानि तानि प्रणश्यन्ति / प्रदक्षिणः पदे पदे ॥

    अर्थ: तुलसी महारानी की परिक्रमा करते समय व्यक्ति जो कदम उठाता है, उस प्रत्येक कदम के साथ ब्रह्म-हत्या जैसे जघन्य पापों सहित उसके समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं।

    श्री शिक्षाष्टकम्

    श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा रचित आठ श्लोक, जो सम्पूर्ण कृष्णभावनामृत का सार हैं।

    संस्कृत श्लोक

    श्लोक 1

    चेतो-दर्पण-मार्जनं भव-महा-दावाग्नि-निर्वापणम् / श्रेयः-कैरव-चन्द्रिका-वितरणं विद्या-वधू-जीवनम् । आनन्दाम्बुधि-वर्धनं प्रति-पदं पूर्णामृतास्वादनं / सर्वात्म-स्नपनं परं विजयते श्री-कृष्ण-सङ्कीर्तनम् ॥

    अर्थ: श्री कृष्ण संकीर्तन की परम विजय हो, जो हृदय रूपी दर्पण को स्वच्छ करने वाला है और जन्म-मरण रूपी महा-दावानल (अग्नि) को बुझाने वाला है। यह परम कल्याण रूपी श्वेत कमल को प्रफुल्लित करने वाली चांदनी है और समस्त विद्याओं का जीवन है। यह आनन्द के सागर को बढ़ाने वाला है और नित्य पूर्ण अमृत का आस्वादन कराता है।

    श्लोक 2

    नाम्नामकारि बहुधा निज-सर्व-शक्तिस् / तत्रार्पिता नियमितः स्मरणे न कालः । एतादृशी तव कृपा भगवन् ममापि / दुर्दैवमीदृशमिहाजनि नानुरागः ॥

    अर्थ: हे भगवान! आपका पवित्र नाम जीवों का पूर्ण मंगल करने वाला है, इसलिए आपने अपने नाम को विभिन्न रूपों में प्रकट किया है और उसमें अपनी समस्त शक्तियाँ अर्पित कर दी हैं। इन नामों के स्मरण के लिए कोई कठोर नियम या समय निर्धारित नहीं है। हे प्रभु! यह आपकी असीम कृपा है, किंतु मेरा दुर्भाग्य ऐसा है कि इतने पर भी मुझे आपके पवित्र नाम से कोई अनुराग नहीं है।

    श्लोक 3

    तृणादपि सुनीचेन / तरोरपि सहिष्णुना । अमानिना मानदेन / कीर्तनीयः सदा हरिः ॥

    अर्थ: व्यक्ति को मार्ग में पड़े हुए घास के तिनके से भी अधिक विनम्र होकर, वृक्ष से भी अधिक सहनशील होकर, और अपने लिए किसी सम्मान की अपेक्षा न करते हुए दूसरों को सम्मान देकर निरंतर श्री हरि के नाम का कीर्तन करना चाहिए।

    श्लोक 4

    न धनं न जनं न सुन्दरीं / कवितां वा जगदीश कामये । मम जन्मनि जन्मनीश्वरे / भवताद् भक्तिरहैतुकी त्वयि ॥

    अर्थ: हे जगदीश्वर! मुझे न तो धन चाहिए, न अनुयायी चाहिए, न सुन्दर स्त्रियों की कामना है और न ही काव्य या यश की। मेरी एकमात्र यही अभिलाषा है कि जन्म-जन्मांतर तक आपके चरण कमलों में मेरी अहैतुकी (निष्काम) भक्ति बनी रहे।

    श्लोक 5

    अयि नन्द-तनुज किङ्करं / पतितं मां विषमे भवाम्बुधौ । कृपया तव पाद-पङ्कज / स्थित-धूलि-सदृशं विचिन्तय ॥

    अर्थ: हे नन्द-नंदन (कृष्ण)! मैं आपका ही नित्य दास हूँ, फिर भी अपने कर्मों के कारण जन्म और मृत्यु के इस भयानक और कष्टदायक महासागर में गिर गया हूँ। कृपा करके आप मेरा उद्धार करें और मुझे अपने चरण कमलों की धूलि के एक कण के समान स्वीकार करें।

    श्लोक 6

    नयनं गलद्-अश्रु-धारया / वदनं गद्गद-रुद्धया गिरा । पुलकैर्निचितं वपुः कदा / तव नाम-ग्रहणे भविष्यति ॥

    अर्थ: हे प्रभु! आपके पवित्र नाम का कीर्तन करते हुए कब मेरे नेत्रों से अश्रुओं की धारा बहेगी? कब मेरा कंठ गद्गद होकर रुंध जाएगा? और कब आपके नाम का उच्चारण करने से मेरे शरीर में रोमांच उत्पन्न होगा?

    श्लोक 7

    युगायितं निमेषेण / चक्षुषा प्रावृषायितम् । शून्यायितं जगत् सर्वं / गोविन्द-विरहेण मे ॥

    अर्थ: हे गोविन्द! आपके विरह में, मुझे एक क्षण भी एक युग के समान प्रतीत हो रहा है। मेरे नेत्रों से वर्षा ऋतु की भाँति अश्रु बह रहे हैं, और आपके बिना मुझे यह सारा संसार ही सूना लग रहा है।

    श्लोक 8

    आश्लिष्य वा पाद-रतां पिनष्टु माम् / अदर्शनान् मर्म-हतां करोतु वा । यथा तथा वा विदधातु लम्पटो / मत्-प्राण-नाथस् तु स एव नापरः ॥

    अर्थ: वे मेरी परम स्वतंत्र गति हैं, चाहे वे मुझे हृदय से लगा लें या दर्शन न देकर मेरा मन मसोस डालें। वे परम लम्पट (स्वेच्छाचारी) हैं, जो चाहें मेरे साथ कर सकते हैं, किंतु वे ही मेरे प्राणनाथ हैं और उनके सिवाय कोई दूसरा नहीं है।

    हरिनाम के प्रति दस नाम-अपराध

    पद्म पुराण के अनुसार भगवान के पवित्र नाम का जप करते समय निम्नलिखित दस नाम-अपराधों से बचना चाहिए।

    अपराध 1

    १. भगवन्नाम का प्रचार-प्रसार करने वाले भक्तों की निंदा करना।

    अपराध 2

    २. भगवान शिव या ब्रह्मा जैसे देवताओं के नामों को भगवान विष्णु के नाम के समान या उनसे स्वतंत्र समझना।

    अपराध 3

    ३. आध्यात्मिक गुरु की आज्ञा की अवहेलना करना या उन्हें साधारण मनुष्य समझना।

    अपराध 4

    ४. वैदिक शास्त्रों या उनके अनुकूल शास्त्रों की निंदा करना।

    अपराध 5

    ५. हरे कृष्ण महामंत्र के कीर्तन की महिमा को काल्पनिक समझना।

    अपराध 6

    ६. भगवान के पवित्र नाम में अर्थवाद (स्वयं का मनोकल्पित अर्थ) लगाना।

    अपराध 7

    ७. पवित्र नाम के बल पर पाप कर्म करना।

    अपराध 8

    ८. हरे कृष्ण कीर्तन को वेदों में वर्णित सकाम कर्मकाण्ड (शुभ अनुष्ठानों) के समान मानना।

    अपराध 9

    ९. श्रद्धारहित व्यक्ति को पवित्र नाम की महिमा का उपदेश देना।

    अपराध 10

    १०. पवित्र नाम में पूर्ण विश्वास न होना और इतने उपदेशों को समझने के बाद भी भौतिक आसक्ति बनाए रखना। जप करते समय असावधान (प्रमाद) रहना भी एक अपराध है।

    Lord Jagannath Baladeva Subhadra deities temple darshan
    Srila Prabhupada founder ISKCON spiritual master portrait