ब्रज जन मन सुखकारी — राधे श्याम भजन
रचयिता: श्रील भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराज | ब्रज भाषा भजन | गौड़ीय वैष्णव परम्परा
श्रील नारायण महाराज द्वारा रचित एवं प्रचारित ब्रज भाषा का अनुपम भजन, जो श्रीकृष्ण को व्रजवासियों के आनन्ददाता के रूप में गाता है
ब्रज जन मन सुखकारी — श्रील भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराज द्वारा रचित एक मनोहर ब्रज भाषा भजन, जो भगवान श्रीकृष्ण को समस्त व्रजवासियों के आनन्ददाता के रूप में महिमामंडित करता है। 'राधे श्याम' की टेक के साथ यह भजन श्री राधा और श्री कृष्ण की एक साथ जय-जयकार करता है।
श्रील प्रभुपाद तथा श्रील नारायण महाराज के चरण-कमलों में कृतज्ञता — उनकी अहैतुकी कृपा से यह ब्रज भाषा भजन आज सारे विश्व में गूँज रहा है।
राधा-कृष्ण भजन-कीर्तन या वृन्दावन यात्रा के समय यह भजन गाएं और श्रीकृष्ण के मनोहर रूप एवं व्रज-लीलाओं का स्मरण करें।
मूल (हिन्दी उच्चारण)
(1)
ब्रज जन मन सुखकारी, राधे श्याम श्यामा श्याम
(2)
मोर मुकुट मकराकृत कुण्डल, गल वैजयंती माला चरणन नुपर रसाल राधे श्याम श्यामा श्याम
(3)
सुन्दर वदन कमल-दल लोचन, बांकी चितवन हारी मोहन वंशी विहारी राधे श्याम श्यामा श्याम
(4)
वृन्दावन में धेनु चरावे, गोपीजन मन हारी श्री गोवेर्धन धारी राधे श्याम श्यामा श्याम
(5)
राधा कृष्ण मिली अब दोऊ, गौर रूप अवतारी कीर्तन धर्म प्रचारी राधे श्याम श्यामा श्याम
(6)
तुम बिन मेरा और ना कोई, नाम रूप अवतारी चरणन में बलिहारी, राधे श्याम श्यामा श्याम नारायण बलिहारी, राधे श्याम श्यामा श्याम
हिन्दी अर्थ
1) कृष्ण सभी व्रजवासियों के हृदय में प्रसन्नता प्रदान करते हैं - राधे! श्यामा! श्यामा! श्यामा!
2) वे मोर पंख का मुकुट, मकर के आकार के झुमके और वैजयंती माला धारण करते हैं, और उनके पायल की ध्वनि रस से परिपूर्ण है! राधे! श्यामा! श्यामा! श्यामा!
3) उनका कमलनुमा मुख अत्यंत सुंदर है और उनकी आंखें कमल की पंखुड़ियों के समान हैं। इधर-उधर विचरण करते हुए वे अपनी बांसुरी और त्रिगुणित रूप से सभी को मोहित कर लेते हैं! राधे! श्यामा! श्यामा! श्यामा!
4) वृन्दावन में वह चरागाहों में गायें चराते हैं, गोपियों का मन चुराते हैं, और श्री गोवर्धन पर्वत को धारण करते हैं! राधे! श्यामा! श्यामा! श्यामा!
5) श्री राधा-कृष्ण एक हो गए हैं और अब दोनों सुंदर स्वर्ण अवतार के रूप में कीर्तन-धर्म का उपदेश देते हुए आए हैं। राधे! श्यामा! श्यामा! श्यामा!
6) इस संसार में आपके सिवा मेरा कोई नहीं। आप सुंदर नाम और सुंदर रूप के अवतार के रूप में अवतरित होते हैं। आपके चरण कमल मुझे विस्मय से भर देते हैं - इसलिए यह नारायण आनंद से परिपूर्ण है! राधे! श्यामा! श्यामा! श्यामा!
विशेष टिप्पणी
यह भजन दैनिक राधा-कृष्ण कीर्तन, वृन्दावन यात्रा तथा राधाष्टमी, जन्माष्टमी एवं गौर पूर्णिमा के उत्सवों पर गाया जाता है। चौथे पद में यह गहन सत्य प्रकट होता है कि श्री राधा-कृष्ण एक साथ श्री चैतन्य महाप्रभु के रूप में अवतरित हुए।
आध्यात्मिक महत्त्व
'राधे श्याम' की टेक श्री राधा और श्री कृष्ण की एक साथ संयुक्त महिमा है — 'राधे' श्रीमती राधारानी का आह्वान है, जो भगवान की आह्लादिनी शक्ति की मूर्ति हैं, और 'श्याम' श्री कृष्ण का आह्वान है, व्रज के सर्व-आकर्षक श्याम-वर्ण भगवान। इन दोनों नामों को एक साथ गाना केवल कृष्ण की नहीं, अपितु अपने सर्वाधिक अन्तरंग प्रेम-सम्बन्धों की पूर्णता में कृष्ण की महिमा गाना है। यही गौड़ीय वैष्णव भक्ति का हृदय है।
श्रील नारायण महाराज के बारे में
यह भजन श्रील भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराज (1921–2010) द्वारा रचित एवं प्रचारित है, जो गौड़ीय वैष्णव परम्परा के प्रमुख आचार्य तथा श्रील भक्ति प्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराज के घनिष्ठ पार्षद थे। इसका सर्वाधिक गहन तत्त्व चौथे पद में प्रकट होता है — 'राधा कृष्ण मिली अब दोऊ, गौर रूप अवतारी' — जो घोषित करता है कि श्री राधा और श्री कृष्ण एक साथ श्री चैतन्य महाप्रभु के रूप में, कीर्तन-धर्म का प्रचार करने हेतु अवतरित हुए।
कब गाएं
दैनिक राधा-कृष्ण कीर्तन एवं सत्संग, वृन्दावन तीर्थयात्रा, व्रज-मण्डल परिक्रमा तथा राधाष्टमी, जन्माष्टमी और गौर पूर्णिमा के उत्सवों पर यह भजन गाया जाता है।
आचार्यों का भाष्य
'व्रज-जन' शब्द व्रजवासियों की ओर संकेत करता है — जो कृष्ण के साथ नित्य, स्वाभाविक प्रेम-सम्बन्ध में रहते हैं: उनके माता-पिता, ग्वाल-सखा, गोपियाँ तथा वृन्दावन की गायें, वृक्ष और नदियाँ भी। कृष्ण उनके 'सुख-कारी' हैं, उनके आनन्द के मूल स्रोत। यह भजन कृष्ण के मनोहर रूप से आरम्भ होकर, उनकी व्रज-लीलाओं से होते हुए, गौर रूप में उनके अवतरण की परम घोषणा तक और अन्ततः पाँचवें पद में गायक के आत्म-समर्पण तक पहुँचता है।
आध्यात्मिक फल
यह भजन गाने से श्री राधा-कृष्ण का प्रेमपूर्ण स्मरण जाग्रत होता है, कृष्ण के मनोहर रूप एवं व्रज-लीला के प्रति आकर्षण गहरा होता है, श्री चैतन्य महाप्रभु के स्वर्णिम मिशन से जुड़ाव होता है, हृदय आनन्दमय कीर्तन द्वारा शुद्ध होता है और भगवान के प्रति अनन्य समर्पण का भाव विकसित होता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
ब्रज जन मन सुखकारी भजन के रचयिता कौन हैं?
यह ब्रज भाषा भजन श्रील भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराज (1921–2010) द्वारा रचित एवं प्रचारित है, जो गौड़ीय परम्परा के प्रमुख वैष्णव आचार्य थे। यह भगवान श्रीकृष्ण को समस्त व्रजवासियों के आनन्ददाता के रूप में महिमामंडित करता है।
'ब्रज जन मन सुखकारी' का अर्थ क्या है?
इसका अर्थ है 'जो समस्त व्रजवासियों (व्रज के निवासियों) के हृदय में आनन्द प्रदान करते हैं।' टेक 'राधे श्याम' श्री राधा और श्री कृष्ण की एक साथ महिमा गाती है — राधा, और श्याम (श्याम-वर्ण कृष्ण)।
इस भजन के चौथे पद का क्या महत्त्व है?
चौथा पद एक गहन तत्त्व प्रकट करता है: श्री राधा और श्री कृष्ण एक होकर श्री चैतन्य महाप्रभु के रूप में — स्वर्ण अवतार (गौर रूप अवतारी) के रूप में — कीर्तन-धर्म, अर्थात् कलियुग के लिए पवित्र नामों के संकीर्तन का प्रचार करने हेतु अवतरित हुए।



