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    माङ्गलाचरण प्रार्थनाएँ

    गौड़ीय वैष्णव परम्परा | भगवद्गीता एवं श्रीमद्भागवतम् कक्षा से पूर्व की मंगल-प्रार्थनाएँ

    भगवद्गीता और श्रीमद्भागवतम् की कक्षाओं से पूर्व गाई जाने वाली आमन्त्रण-प्रार्थनाओं का सम्पूर्ण क्रम।

    माङ्गलाचरण का अर्थ है 'मंगलमय आरम्भ' — गौड़ीय वैष्णव परम्परा में किसी भी आध्यात्मिक प्रवचन, शास्त्र-अध्ययन या सत्संग के आरम्भ में गाई जाने वाली प्रार्थनाओं का क्रम। ये प्रार्थनाएँ गुरु-परम्परा, श्री कृष्ण, श्रीमती राधारानी तथा वैष्णवों का आशीर्वाद माँगती हैं और दिव्य विषयों की चर्चा की अनुमति प्रार्थित करती हैं। नीचे सम्पूर्ण माङ्गलाचरण क्रम संस्कृत तथा हिन्दी अर्थ सहित दिया गया है।

    श्रील प्रभुपाद के चरण-कमलों में कृतज्ञता, जिनकी अहैतुकी कृपा से ये मंगल-प्रार्थनाएँ आज सारे विश्व में गुरु-परम्परा से जुड़ती हैं।

    किसी भी कक्षा, सत्संग या व्यक्तिगत अध्ययन के आरम्भ में इन प्रार्थनाओं का पाठ करें।

    मूल श्लोक (संस्कृत)

    (1)

    oṁ ajñāna-timirāndhasya jñānāñjana-śalākayā cakṣur unmīlitaṁ yena tasmai śrī-gurave namaḥ

    (2)

    śrī-caitanya-mano-'bhīṣṭaṁ sthāpitaṁ yena bhū-tale svayaṁ rūpaḥ kadā mahyaṁ dadāti sva-padāntikam

    (3)

    vande 'haṁ śrī-guroḥ śrī-yuta-pada-kamalaṁ śrī-gurūn vaiṣṇavāṁś ca śrī-rūpaṁ sāgrajātaṁ saha-gaṇa-raghunāthānvitaṁ taṁ sa-jīvam sādvaitaṁ sāvadhūtaṁ parijana-sahitaṁ kṛṣṇa-caitanya-devaṁ śrī-rādhā-kṛṣṇa-pādān saha-gaṇa-lalitā-śrī-viśākhānvitāṁś ca

    (4)

    he kṛṣṇa karuṇā-sindho dīna-bandho jagat-pate gopeśa gopikā-kānta rādhā-kānta namo 'stu te

    (5)

    tapta-kāñcana-gaurāṅgi rādhe vṛndāvaneśvari vṛṣabhānu-sute devi praṇamāmi hari-priye

    (6)

    vāñchā-kalpatarubhyaś ca kṛpā-sindhubhya eva ca patitānāṁ pāvanebhyo vaiṣṇavebhyo namo namaḥ

    (7)

    śrī-kṛṣṇa-caitanya prabhu-nityānanda śrī-advaita gadādhara śrīvāsādi-gaura-bhakta-vṛnda

    (8)

    hare kṛṣṇa hare kṛṣṇa kṛṣṇa kṛṣṇa hare hare hare rāma hare rāma rāma rāma hare hare

    (9)

    oṁ namo bhagavate vāsudevāya

    (10)

    nārāyaṇaṁ namaskṛtya naraṁ caiva narottamam devīṁ sarasvatīṁ vyāsaṁ tato jayam udīrayet

    (11)

    naṣṭa-prāyeṣv abhadreṣu nityaṁ bhāgavata-sevayā bhagavaty uttama-śloke bhaktir bhavati naiṣṭhikī

    (12)

    kṛṣṇāya vāsudevāya devakī-nandanāya ca nanda-gopa-kumārāya govindāya namo namaḥ

    (13)

    namaḥ paṅkaja-nābhāya namaḥ paṅkaja-māline namaḥ paṅkaja-netrāya namas te paṅkajāṅghraye

    (14)

    namo mahā-vadānyāya kṛṣṇa-prema-pradāya te kṛṣṇāya kṛṣṇa-caitanya-nāmne gaura-tviṣe namaḥ

    (15)

    namo brahmaṇya-devāya go-brāhmaṇa-hitāya ca jagad-dhitāya kṛṣṇāya govindāya namo namaḥ

    (16)

    nama oṁ viṣṇu-pādāya kṛṣṇa-preṣṭhāya bhū-tale śrīmate bhaktivedānta-svāmin iti nāmine

    (17)

    namas te sārasvate deve gaura-vāṇī-pracāriṇe nirviśeṣa-śūnyavādi-pāścātya-deśa-tāriṇe

    (18)

    jaya śrī-kṛṣṇa-caitanya prabhu nityānanda śrī-advaita gadādhara śrīvāsādi-gaura-bhakta-vṛnda

    (19)

    hare kṛṣṇa hare kṛṣṇa kṛṣṇa kṛṣṇa hare hare hare rāma hare rāma rāma rāma hare hare

    हिन्दी अर्थ

    1) मैं अज्ञान रूपी अंधकार में जन्मा था, और मेरे आध्यात्मिक गुरु ने ज्ञान रूपी शलाका से मेरी आँखें खोल दीं। मैं उन्हें सादर प्रणाम करता हूँ।

    2) श्रील रूप गोस्वामी प्रभुपाद, जिन्होंने इस भौतिक जगत् में भगवान् चैतन्य महाप्रभु की मनोकामना को स्थापित किया है, वे मुझे अपने चरण कमलों में आश्रय कब प्रदान करेंगे?

    3) मैं अपने आध्यात्मिक गुरु और भक्ति-मार्ग के समस्त आचार्यों के चरण कमलों में तथा सभी वैष्णवों को प्रणाम करता हूँ। मैं श्रील रूप गोस्वामी, उनके ज्येष्ठ भ्राता सनातन गोस्वामी, श्री रघुनाथदास गोस्वामी, श्री जीव गोस्वामी तथा उनके सहयोगियों को प्रणाम करता हूँ। मैं अद्वैत आचार्य प्रभु, श्री नित्यानंद प्रभु, श्री चैतन्य महाप्रभु और श्रीवास ठाकुर के नेतृत्व में उनके समस्त भक्तों को प्रणाम करता हूँ। तदनन्तर, मैं ललिता एवं विशाखा सखियों सहित श्रीमती राधारानी और श्री कृष्ण के चरण कमलों में सादर प्रणाम करता हूँ।

    4) हे कृष्ण! आप दया के सागर, दीनों के बंधु और संपूर्ण जगत् के स्वामी हैं। आप गोपों के ईश्वर हैं और गोपियों तथा श्रीमती राधारानी के कांत हैं। मैं आपको बारंबार प्रणाम करता हूँ।

    5) पिघले हुए स्वर्ण के समान गौर वर्ण वाली हे राधिके! आप वृंदावन की स्वामिनी हैं। आप राजा वृषभानु की पुत्री हैं और भगवान् हरि को अत्यंत प्रिय हैं। हे देवी! मैं आपको प्रणाम करता हूँ।

    6) जो कल्पवृक्ष के समान सबकी मनोकामनाएँ पूर्ण करने वाले हैं, दया के सागर हैं तथा पतित आत्माओं का उद्धार करने वाले हैं, उन समस्त वैष्णव भक्तों को मैं बारंबार प्रणाम करता हूँ।

    7) मैं श्री कृष्ण चैतन्य, प्रभु नित्यानंद, श्री अद्वैत, गदाधर, श्रीवास तथा श्री चैतन्य महाप्रभु के समस्त भक्तों को प्रणाम करता हूँ।

    8) हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।

    9) मैं भगवान् वासुदेव (श्री कृष्ण) को अपने सादर प्रणाम अर्पित करता हूँ।

    10) विजय प्राप्त कराने वाले इस श्रीमद्भागवतम् का पाठ करने से पूर्व मनुष्य को भगवान् नारायण, नर-नारायण ऋषि, विद्या की देवी माँ सरस्वती और महर्षि वेदव्यास को सादर प्रणाम करना चाहिए।

    11) भागवत की कक्षाओं में नियमित उपस्थित रहने और शुद्ध भक्त की सेवा करने से हृदय की समस्त अशुभ वृत्तियाँ लगभग पूर्णतः नष्ट हो जाती हैं, और उत्तम श्लोकों से प्रशंसित भगवान् के प्रति निश्चल प्रेमाभक्ति स्थापित हो जाती है।

    12) जो वसुदेव के पुत्र, देवकी के आनंददाता, नंदबाबा और वृंदावन के गोपों के बालक तथा इंद्रियों व गायों को आनंद देने वाले गोविंद हैं, उन भगवान् कृष्ण को मैं बारंबार प्रणाम करता हूँ।

    13) हे प्रभु! जिनकी नाभि में कमल का चिह्न अंकित है, जो कमल की माला धारण करते हैं, जिनके नेत्र कमल के समान सुंदर हैं और जिनके चरण कमल रूपी हैं, आपको मेरा बारंबार प्रणाम।

    14) हे परम औदार्यमय अवतार! आप स्वयं कृष्ण हैं जो श्री कृष्ण चैतन्य महाप्रभु के रूप में प्रकट हुए हैं। आपने श्रीमती राधारानी का स्वर्ण कांति वर्ण धारण किया है और आप कृष्ण-प्रेम बाँट रहे हैं। हम आपको सादर प्रणाम करते हैं।

    15) जो योग्य ब्राह्मणों द्वारा पूजित हैं, गायों एवं ब्राह्मणों के हितैषी हैं तथा संपूर्ण जगत् का कल्याण करने वाले हैं, उन भगवान् कृष्ण (गोविंद) को मैं बारंबार प्रणाम करता हूँ।

    16) मैं उनके चरण कमलों में सादर प्रणाम अर्पित करता हूँ जो भगवान् कृष्ण को अत्यंत प्रिय हैं—परमहंस परिव्राजकाचार्य श्री श्रीमद् ए.सी. भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद।

    17) हे आध्यात्मिक गुरु! सरस्वती गोस्वामी के सेवक, आपको हमारा सादर प्रणाम। आप दयापूर्वक श्री चैतन्य महाप्रभु के संदेश का प्रचार कर रहे हैं और निर्विशेषवाद तथा शून्यवाद से भरे पश्चिमी देशों का उद्धार कर रहे हैं।

    18) श्री कृष्ण चैतन्य, प्रभु नित्यानंद, श्री अद्वैत, गदाधर और श्रीवास आदि समस्त गौर-भक्तवृंद की जय हो।

    19) हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।

    विशेष टिप्पणी

    ये प्रार्थनाएँ किसी भी प्रवचन, जप या शास्त्र-पाठ के आरम्भ में गाई जाती हैं, जिससे हृदय विनम्र होकर दिव्य ज्ञान ग्रहण करने योग्य बनता है।

    आध्यात्मिक महत्त्व

    माङ्गलाचरण का हृदय 'परम्परा-सिद्धान्त' है — परमात्मा का ज्ञान मानसिक कल्पना से नहीं, अपितु गुरुओं की अवरोही श्रृंखला से प्राप्त होता है (एवं परम्परा-प्राप्तम्, भगवद्गीता ४.२)। पहले गुरु-परम्परा को प्रणाम करके वक्ता स्वयं को इसी दिव्य ज्ञान-धारा से जोड़ता है, जिससे उसके वचन पूर्ववर्ती आचार्यों की शक्ति धारण करते हैं।

    शास्त्रीय स्रोत

    ये प्रार्थनाएँ सीधे शास्त्र तथा आचार्यों से ली गई हैं — 'ॐ अज्ञान-तिमिरान्धस्य' गौतमीय-तन्त्र से; 'नारायणं नमस्कृत्य' (श्रीमद्भागवतम् १.२.४), 'नष्ट-प्रायेष्व' (१.२.१८) तथा कुन्ती-स्तुति (१.८.२१–२२) श्रीमद्भागवतम् से; 'नमो महा-वदान्याय' चैतन्य चरितामृत (मध्य १९.५३) से; तथा श्रील प्रभुपाद की प्रणति-प्रार्थनाएँ उनके शिष्यों द्वारा रचित हैं।

    कब गाएं

    प्रत्येक भगवद्गीता और श्रीमद्भागवतम् कक्षा से पूर्व, मंदिरों में सत्संग एवं कीर्तन के आरम्भ में तथा घर पर व्यक्तिगत अध्ययन, जप या पारिवारिक पूजा से पहले।

    आचार्यों का भाष्य

    विनम्रता ही दिव्य ज्ञान का द्वार है। श्री चैतन्य महाप्रभु ने सिखाया कि निरन्तर हरिनाम-जप के लिए मनुष्य को तृण से भी अधिक विनम्र होना चाहिए। श्री कृष्ण के विषय में बोलने का अधिकार माँगने से पूर्व भक्त अपने से श्रेष्ठ सभी को — गुरु, वैष्णव, भगवान् और उनके पार्षदों को — प्रणाम करता है। इसी समर्पित भाव में शास्त्र का यथार्थ अर्थ हृदय में प्रकट होता है।

    आध्यात्मिक फल

    इस प्रार्थना-क्रम से प्रवचन पर गुरु-परम्परा का आशीर्वाद उतरता है, विनम्रता का विकास होता है, वातावरण तथा वक्ता-श्रोता दोनों के हृदय शुद्ध होते हैं, और कक्षा अखण्ड ज्ञान-धारा से जुड़ती है।

    अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

    माङ्गलाचरण क्या है?

    माङ्गलाचरण का अर्थ है 'मंगलमय आरम्भ' — गौड़ीय वैष्णव परम्परा में किसी भी आध्यात्मिक प्रवचन, शास्त्र-अध्ययन या सत्संग से पूर्व गाई जाने वाली प्रार्थनाओं का क्रम, जो गुरु-परम्परा, श्री कृष्ण, श्रीमती राधारानी और वैष्णवों का आशीर्वाद माँगती हैं।

    'ॐ अज्ञान-तिमिरान्धस्य' का अर्थ क्या है?

    इसका अर्थ है: 'मैं घोर अज्ञान के अंधकार में जन्मा था, और मेरे आध्यात्मिक गुरु ने ज्ञान की मशाल से मेरी आँखें खोल दीं। मैं उन्हें सादर प्रणाम करता हूँ।' यह माङ्गलाचरण का आरम्भिक गुरु-प्रणाम है।

    क्या मैं घर पर माङ्गलाचरण का पाठ कर सकता हूँ?

    हाँ। व्यक्तिगत शास्त्र-पाठ, जप या पारिवारिक सत्संग से पूर्व आप घर पर इन प्रार्थनाओं का पाठ कर सकते हैं। गुरु-परम्परा और भगवान् को प्रणाम करने के लिए किसी औपचारिक दीक्षा की आवश्यकता नहीं होती।

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